वास्तुशास्त्र: वेदों के अनुसार वास्तु शास्त्र

 

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2 विश्व की सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में गृह को वेश्म कहा गया है। घर की प्राप्ति पुण्यों के फलस्वरुप होती है ये बात भी कही गयी है। घर में जन्म से पूर्व ही नौ-ग्रह यथा-स्थिति विराजमान होते हैं मात्र चन्द्रमा की स्थिति में परिवर्तन संभव होता है और जिस घर में हम पैदा होते है। वह हमारी जन्मपत्रिका में भी वहीँ दिखायी देते हैं। इसी प्रकार वास्तोष्पति का भी उल्लेख किया गया है-
2.1 पुराणों में वास्तुशास्त्र-
2.1.1 मत्स्यपुराण में वास्तुशास्त्र के अठारहों आचार्यों का नामोल्लेख है -— व वास्तुपुरुषों की उत्पत्ति का विवरण भी दिया गया है —-
2.1.1.1 पालि – प्राकृत एवं अपभ्रंश आदि प्राचीन भाषाओं में वास्तुशास्त्र – भगवान् बुद्ध का वास्तविक जन्म समय कलियुग के १३१० वर्ष बीतने पर अर्थात् आज से लगभग ३८०० वर्ष पूर्व अथवा ईसासे १८०० वर्ष पूर्व हुआ था परन्तु आज जो उनकी जन्म-तिथि स्कूलों में रटाई जा रही है वह तो बारह सौ वर्ष अर्वाचीन है। उनके समय में भी वास्तुकला उन्नति पर थी। बौद्धकाल में २७ गणतन्त्र थे, उनकी राजधानियों के नगर भव्य रूप में बसे हुए थे। पाटली पुत्र नगर अनेक परकोटों से युक्त था। भिक्षुओं के लिये अनेक विहार तथा भगवान् बुद्ध की अस्थि पर अनेक स्तूप उस काल में बनाये गये। पालि भाषा में श्रीलंका तथा बर्मा आदि में कुछ ग्रन्थ- ज्योतिष आयुर्वेद तथा वास्तुशास्त्र पर भी लिखे गये। उत्तरकाल में भिक्षुओं के लिये अनेक गुफाओं का निर्माण भी हुआ। नालन्दा एवं तक्षशिला के विश्वविद्यालयों के वास्तु भी बौद्धकाल में ही बने। धनी गृहस्थ विशाल बौद्धविहार बनवाकर भिक्षुओं को दान कर देते थे। विमानवत्थु में भिक्षुओं को विहारदान का फल बताते हुए कहा है-
2.1.1.1.1 विश्व को भारतीय वास्तुकला की देन – मिश्र के पिरामिडों में कुछ स्थलों पर वैष्णव तिलक लगाये हुए कारीगरों के चित्र खुदे हुए पाये गये हैं, जो इस बात के प्रमाण हैं कि उन पिरामिडों के निर्माता भारतीय ही थे। मुस्लिमतीर्थ मक्का में भी भारतीय वास्तुविदों ने विशाल मन्दिर बनाया था जिसमें हरिहरेश्वर विम्ब (चौकोर पत्थर) के साथ वर्ष के ३६० दिनों (सूर्य के अंशों) की प्रतीक ३६० मूर्तियाँ रखी गयी थीं। इटली की वेटिकन नगरी में आज भी बड़े-बड़े शिवलिंग खड़े हुए हैं। अमेरिका में पुरातत्त्व खुदाईयों में कुछ स्थलों पर गणेशजी की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। अफगानिस्तान की विशाल बुद्ध प्रतिमा भारतीय वास्तुकला का जीता जागता नमूना है। पूर्व के बौद्ध मन्दिरों पर भारतीय वास्तुकला का स्पष्ट प्रभाव दृष्टिगोचर होता है।
2.1.1.1.3 वास्तुशास्त्र के स्वतन्त्रग्रन्थ —— वास्तुशास्त्र पर देववाणी संस्कृत में सैकड़ों ग्रन्थ लिखे गये थे, जिनमें से बहुत कुछ जो भी बचे हैं वे चेन्नई, तिरुवनन्तपुरम् बड़ौदा मैसूर आदि के पौर्वात्य पुस्तकालयों में उपलब्ध हैं। इनमें से प्रमुख निम्न हैं – १. वास्तुमण्डन, २. गृहवास्तुसार, ३. निर्दोषवास्तु, ४. वास्तुचक्र, ५. वास्तुशास्त्र (भोजदेव), ६. वास्तुमंजरी, ७. वास्तुवाधिकार, ८. मानविज्ञान, ९. विश्वम्भरवास्तु, १०. प्रासादनिर्णय ११. कुमारवास्तु १२. आयादि लक्षण, १३. वास्तुविधि, १४. वास्तुरनावली, १५. वास्तुपद्धति, १६. वास्तुतिलक, १७. वास्तुसौख्यम् (टोडरमलकृत), १८. वास्तुविद्यापति, १९. विश्वकर्मप्रकाश, २०. मयमतम्, २१. मानसार तथा २२. वास्तुसूत्र उपनिषद् । इनमें से कुछ प्रकाशित भी हो चुके हैं।

वास्तुशास्त्र: कला किसी भी सभ्यता और संस्कृति की जीवंत साक्ष्य होती है। इस पृथ्वी पर सामूहिक रूप से अनुकूलन के साथ निवास स्थान बनाने की विद्या को वास्तुविद्या कहा जाता है। ‘समराङ्गणसूत्रधार‘  नामक वास्तुग्रंथ में कहा गया है कि पृथ्वी मुख्य वास्तु हैं, उन पर जो उत्पन्न होते हैं, उनके निवास (आश्रय) हैं जो प्रसादादि बनाये जाते हैं, वे भी (गौण) वास्तु कहे जाते हैं-

‘भूरेव मुख्यं वास्तु तत्र जन्मनि अर्थात्हि।

प्रसादादिनि वस्तुनि वस्तुत वास्तुसंश्रयात् ॥’ 

वास्तुशास्त्र:  संस्कृत के ‘आर्किदक्षतौर्य’ शब्द का ही अपभ्रंश  Architectura शब्द है।

‘वास्तुविद्या’ को वास्तुशास्त्र, शिल्पशास्त्र तथा स्थापत्यवेद भी कहते हैं।  अंग्रेजी में इसे आर्किटेक्चर कहा जाता है।  अंग्रेजी में यह शब्द सोंलवीं शताब्दी में लैटिन भाषा के Architectura शब्द से लिया गया है जो वास्तव में संस्कृत के आर्किदक्षतौर्य शब्द का अपभ्रंश है।  यह शब्द आर्कि+दक्ष+तौर्य से बना है।  संस्कृत तौर्य का अर्थ शिल्प, चातुर्य, विद्या या कला आदि होता है।  ‘दक्ष’ धातु का अर्थ चतुरता का चित्रण करना तथा ‘अर्की’ का अर्थ सूर्यपुत्र मनु होता है।  इस शब्द का प्रयोग देवशिल्पी त्वष्टा के लिए भी किया जाता है, जिन्होंने मार्तंड सूर्य को काट-छटकर छोटा और सुंदर बना दिया था, जिससे उनकी उग्रता में नवीनता हो गई थी और वे पृथ्वीवासियों के लिए सहन करने योग्य हो गए थे।  इस प्रकार से जिस विद्या का प्रचार मनु के द्वारा मानव कल्याण के लिए सूर्य की ऊर्जा का विशेष उपयोग करते हुए मानव द्वारा पृथ्वी पर किया गया, उसे ‘अर्किदक्षतौर्य’ अर्थात विष्णु की विद्या कहा गया। 

 

  वास्तुशास्त्र: वेदों के अनुसार वास्तु शास्त्र

 वेदों के अनुसार वास्तु शास्त्र

विश्व की सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में गृह को वेश्म कहा गया है।  घर की प्राप्ति पुण्यों के फलस्वरुप होती है ये बात भी कही गयी है। घर में जन्म से पूर्व ही नौ-ग्रह यथा-स्थिति विराजमान होते हैं मात्र चन्द्रमा की स्थिति में परिवर्तन संभव होता है और जिस घर में हम पैदा होते है। वह हमारी जन्मपत्रिका में भी वहीँ दिखायी देते हैं।   इसी प्रकार वास्तोष्पति का भी उल्लेख किया गया है-

‘भोजस्येदं पुष्कारिनेव वेश्म परिष्कृतं देवमानेव चित्रम् ॥’ 

इसी प्रकार वास्तोस्पति से स्वास्थ्यप्रद गृह तथा विकासात्मक गृह-हेतु प्रार्थना की जाती है –  चतुर्थ मंडल में ‘क्षेत्रपति´ नामक देवता से प्रार्थना करते गृह को अन्नभंडार से युक्त बनाने की प्रार्थना की गयी है।

वस्तोष्पते प्रति जानिह्यस्मान् त्स्वावेशो अनमीवे भव नः।  

यत् त्वेमहे प्रति तन्नो जुषस्व शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे॥

अग्नविष्णु मही तद्वं महित्वं पथो घृतस्य गुह्यस्य नाम।  

दमे-दमे सप्त रत्ना दधानौ प्रति वां जिह्वा घृतमा चरण्यात् ॥  

अग्नविष्णु मही धाम प्रियं वां वीठो घृतस्य गुह्या जुषाणौ।  

दमे-दमे सुस्तुत्या वधौ प्रति वां जिह्वा घृतमुच्चरायत्॥

अथर्ववेद कांड 7.29.1-2

अथर्वेद में एक स्थान पर गृह के भीतर रहने वाले दो देवों अग्नी तथा विष्णु से घर को रत्न एवम धन से पूरित करने की प्रार्थना करते हुए कहा गया है —— 

       अवश्य पढ़ें नींव निर्माण

 वास्तुशास्त्र: यहां घर के लिए ‘दम’ शब्द का प्रयोग होता है।  दमे-दमे मंत्र का अर्थ है घर-घर में या धाम में। आजकल प्रचलित अंग्रेजी Domestic शब्द का मूल यह अथर्ववेद का ‘दम’ (घर) ही है, जो लैटिन में Domus और रूसी भाषा में दोम और दम ही लिखा और बोला जाता है।  अंग्रेजी के Domoicile, Domed, डोमेस्टिकेट, Domesticity, Domiciliary, Dominance, Dominant, Dominate शब्दों का मूल ‘संस्कृत’ का ‘दम’ ही है।

      इसी प्रकार एक अन्य स्थान पर गृह में विकृति संतान (जो बिना कानों की तथा बड़े सिर की उत्पन्न होती है अथवा अन्य विकृतियों के साथ जन्म लेती हैं) के न जन्म लेने की प्रार्थना करते हुए कहा गया है —

 

‘न विकर्णः पृथुशिरास्तस्मिन् वेश्मनि जायते।  

यस्मिन् राष्ट्रे निरुध्यते ब्रह्मजायाचित्तया॥’

 

पुस्तकों के अतिरिक्त शतपथ ब्राह्मण, तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण  तथा आपस्तम्ब श्रौतसूत्र  वास्तुशास्त्र में वर्णित है।  स्मृतियों एवं पुराणों में वास्तुविद्या का विस्तार से वर्णन है।

 

पुराणों में वास्तुशास्त्र-

अग्निपुराण, मत्स्यपुराण, नारदपुराण आदि में भवन-निर्माण की विद्या बड़ी सूक्ष्मता तथा स्पष्टता के साथ वर्णन किया गया है।  इस प्रकार अत्यंत प्राचीनकाल से ही भारत में वास्तुशास्त्र का ज्ञान प्रचलित है।  अग्निपुराण में प्रसाद-निर्माण के विषय में कहा गया है कि सर्वप्रथम प्रसाद-निर्माण के लिए पृथ्वी की परीक्षा करनी चहिये होती है।  जहाँ की मिट्टी का रंग सफ़ेद हो और घी की सुगंध हो, व  इसी प्रकार लाल तथा रक्त जैसी गंधवाली मिट्टी,  नीलीमा और सुगंधयुक्त मिट्टीवाली तथा काली  मिट्टी से युक्त भूमि गृहनिर्माण में उत्तम कही गई है।  पूर्व, ईशान, उत्तर या सब ओर नीची और मध्य में ऊँची भूमि पर मानी गयी है।  एक हाथ गहराई तक खोदकर निकली हुई मिट्टी यदि फिर उस गड्ढे में डाली जाने पर अधिक हो जाए तो वहां की उत्तम भूमि को  समझना चाहिये। अथवा जल आदि से उसकी परीक्षा करें।  हड्डी और कोयले आदि से दूषित भूमि का शोधन खोदकर, गायों को ठहराकर या बार-बार जोतकर करना चाहिये—

श्रीमद्भागवत-महापुराण में देवशिल्पी भगवान श्रीकृष्ण के आदेश से समुद्र के अंदर द्वारकापुरी नाम से अत्यंत दुर्गम नगर के निर्माण का वर्णन है, जिसमें सभी वस्तुयें अद्भुत थी और जिसकी लम्बाई-चोड़ाई अडतालिस कोस की थी। उस नगर की एक-एक वस्तु में विश्वकर्मा का विज्ञान (वास्तुशास्त्र) और शिल्पकला की निपुणता प्रकट होती थी। उसमें वास्तुशास्त्र के अनुसार बड़ी-बड़ी सडको, चोराहों और गलियों का यथास्थान ठीक-ठीक विभाजन किया गया था —- 

इति सम्मन्त्रय भगवान् दुर्गं द्वादशयोजनम्।  

अंत: समुद्रे नगरं कृत्स्नाद्भुतमचिकरत्॥  

दृश्यते यत्र त्वराष्ट्रं विज्ञानं शिल्पनैपुणम्।  

रथया चत्वरवीथिर्भिर्यथावस्तु विनिर्मितम् ॥

(श्रीमद्भा0 दशम स्कन्ध, अध्याय-)

 

मत्स्यपुराण में वास्तुशास्त्र के अठारहों आचार्यों का नामोल्लेख है -—वास्तुपुरुषों की उत्पत्ति का विवरण भी दिया गया है —-

‘भृगुरुरिवसिष्ठश्च वास्तुविद्या

नारदो नग्नजिच्चैव विशालाक्षः पुरन्दरः ॥

ब्रह्मा कुमारो नन्दीशः शौनको गर्ग एव च। 

वासुदेवोऽनिरुद्धश्च तथा शुक्र बृहस्पतिः ॥  

अष्टादशैते स्वामीमा वास्तुशास्त्रोपदेशकाः।

संक्षिप्तेण उपदिष्टं यन्मनवे मत्स्यरूपिणा।  ‘

(-मत्स्यपुराण अध्याय 252।  2-4 ) 

अठारह वास्तुशास्त्र के उपदेशक विख्यात हैं ————

अर्थात् 1.  भृगु,   2.  अत्रि, 3.    वसिष्ठ,   4.  विश्वकर्मा,   5.  मय,   6.  नारद   7.  नग्नजित्          8.विशालाक्ष,   9. इन्द्र,     10.  ब्रह्मा,   11.  कुमार (कार्तिकेय)   12.  नंदीश्वर,   13.  शौनक     14. गर्ग 15.  वासुदेव 16.अनिरुद्ध 17.  शुक्राचार्य,   तथा   18.  बृहस्पति –   ये अठारह वास्तुशास्त्र के उपदेशक विख्यात हैं।  इन अठारह आचार्यों में मनु (वैवस्वत) को प्रलयकाल में संक्षेप में मत्स्यरूपधारी भगवान ने वास्तुशास्त्र का उपदेश दिया था।   यहां इन वास्तुशास्त्रियों का ऐतिहासिक परिचय अत्यंत आवश्यक होने के कारण जानने योग्य हैं-

 

भृगु-  ये शुक्राचार्य के पिता भृगुवारुणि थे, ये अप्रतिम विद्वान तथा अनेक शास्त्रों सिद्धांतों के ज्ञाता थे। हिरण्यकशिपु की पुत्री दिव्या व्याही थी।  ये ज्योतिषशास्त्र के भी विद्वान थे।

 

अत्रि इनका पूरा नाम अत्रिवरुणि था, ये वरुणदेव के तृतीय पुत्र थे। इन्होने ज्योतिष शास्त्र का भी प्रवर्तन किया था।

 

वसिष्ठ ये पराशर के पिता शक्तिवासिष्ठ थे। इन शक्तिवासिष्ठ के सम्बन्ध सुदास एश्वाक से मधुर थे, परन्तु उनके पुत्र कल्माषपाद से बिगाड़ गए थे। ये बाइसवें व्यास थे। जब इनका संघर्ष कल्माषपाद से हुआ तो उसने इन्हें जला दिया था। कल्माषपाद को ही सोदास कहा गया है। जिसके वंशजो में ही सऊदी अरब का सऊद वंश है।

घर बनवाने से पूर्व सुख़-शांति व सम्रद्धि के लिए पढ़ेंभूमि पूजन  

विश्वकर्मा ये शुक्राचार्य के पुत्र थे, इन्ही को त्वष्टा भी कहा जाता है। इन्हें वास्तु शास्त्र के साथ ज्योतिष का ज्ञान अपने पिता से प्राप्त हुआ था तथा कुछ ज्ञान इन्होने बृहद्रथ से प्राप्त किया था। इनका वध इंद्र द्वारा किया गया था। इनकी माता का नाम “गौ” था, जो की सोमप नामक पितृगणों की पुत्री थी। त्वष्टा के तीन भाई और थे जिनके नाम वरूत्री,शण्ड तथा मय थे। ये असुरो में रहने के कारण असुर कहलाते थे।

मय- यह त्वष्टा (विश्वकर्मा) का तीसरा पुत्र था और इससे छोटी बहिन का नाम ‘सरण्यु’ था, जो विवस्वान (सूर्य) को ब्याही गयी थी।  पारंपरिक ज्योतिष-शास्त्र एवं वास्तुशास्त्र का ज्ञान विवस्वान् से ही प्राप्त हुआ था।  अमेरिका महाद्वीप में जिस मय सभ्यता का उल्लेख मिलता है, वह इसी मय जाति की थी।  इस जाति में अनेक वैज्ञानिक हुए हैं, जिन्हें ‘मय’ ही कहा जाता रहा है।  महाभारत एवं रामायण के मय अलग-अलग व्यक्ति थे और उन्हें इस शास्त्र का ज्ञान परम्परागत रूप से प्राप्त होता रहा था।  रावण का ससुर मय तथा युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में यज्ञभूमि तथा उस काल में अन्य प्रसादों को बनाने वाले मय एक ही थे , परन्तु पण्डित भगवदत्तजी उन्हें एक ही मानते हैं।  (भारतवर्ष का वृहद इतिहास भा ग 1 पृष्ठ 146 )

नारद देवर्षि नारद पूर्वजन्म में परमेष्ठी प्रजापति के पुत्र थे।  पुनः वे दक्ष के पुत्र होकर जन्मे।  इन्हें कश्यप का पुत्र भी माना जाता है।  अतः नारद दक्षपुत्रों के भ्राता थे।  जिस प्रकार का नारद का जन्म एक पहेली है, उसी प्रकार की उनकी दीर्घायु और बहुमुखी प्रतिभा भी एक पहेली है।  इनमें भांजे पर्वत नामक ऋषि थे।  ये ज्योतिष, सामुद्रिक, वास्तु, संगीत, दर्शनशास्त्र सहित अनेक विषय एवं विद्याओं के ज्ञाता थे।  नारदजी के ज्ञानोपदेश से बाद में ये परिव्राजक बन गये थे-

 

‘यं कश्यपं सुतवरं परमेष्ठि विज्ञजन्त।।

दक्ष्यस्य दुहित्रिदक्षशापभयानमुनिः॥’

                                 (हरिवंशपुराण 1 । 3 । 9)

 ‘विनाशसंश कंससी नारदो मथुरा ययौ।’

                                  (हरिवंशपुराण 2 । 1 । 1)

 ‘नारदो मातुलश्चैव भागिनेयश्च पर्वत:।’

                               (महाभारत 12 30 6)

 

नग्नजित्-  इतिहास एवं पुराणों में ये गंधारनरेश कहे जाते हैं।  ये महाभारत युद्ध के दो सहस्त्राब्दी पूर्व या ईस्वी सन् के पांच सहस्राब्दी पूर्व विद्यमान थे।  आयुर्वेद के उपदेष्टा चरक एवं भेल के गुरु पुनर्वसु आत्रेय के समय में ये हुए थे।

 विशालाक्ष – यह भगवान शिव का ही नाम है।  इनका समय निर्धारण नहीं हो सका है, परन्तु या सर्व विद्याओ के प्रवर्तक मने जाते है।

इन्द्र यह भी बहुत दीर्घायु माने जाते है।  ये सप्तम युगीन व्यास थे। इनके पिता प्रजापति परमेष्ठी कश्यप थे। यह सब देवों में कनिष्ठ थे। इनका जन्मकालीन नाम शक्र था। ये वैवस्वतयम के शिष्य थे उनसे इन्होने इतिहास-पुराण का अध्ययन किया था। इन्होने अनेक गुरुओं से अलग-अलग विधाएँ सीखी थीं। ये आयुर्वेद, ज्योतिष, व्याकरण, वास्तुशास्त्र आदि अनेक विषयों के विद्वान थे।

ब्रह्मा – इनका कालनिर्णय अशक्य है; क्योंकि इक्कीस प्रजापतियों को ब्रह्मा नाम से जाना जाता है। ये भी अनेक विधाओं, शास्त्रों तथा वेदादि के लिए व्यास माने जाते हैं।

कुमार इनका नाम स्कन्द एवं कार्तिकेय भी था, ये रुद्र भगवान् शिव के पुत्र थे —–

            इनका समय – निर्धारित नहीं है।

नन्दीश्वर – ये शिव जी के प्रमुख शिष्य एवं सेवक थे, इन्होने अनेक प्रकार के तंत्रों तथा विधाओं का अध्ययन भगवान शंकर से ही प्राप्त किया था। पर्वतीय स्थानों के भवन निर्माण की विद्या में यह पारंगत थे।

शौनक –  शुनक ऋषि के पुत्र गण शौनक कहे जाते है।

 गर्ग – आज से पाँच सहस्राब्दियों पूर्व विद्यमान थे। ये यदुवंश के पुरोहित थे। इनके शिष्यगण एशिया तथा यूरोप के अनेक भागों में थे। रूस का गार्ग्य प्रदेश ही आजकल जार्जिया कहलाता है। श्रीमद्भागवत के दशम स्कन्ध में इनके सम्बन्ध में लिखा है-

‘गर्गः पुरोहितो राजन् यदूनां तु महातपाः । 

ज्योतिषामयनं साक्षाद् यत्तद् ज्ञानमतीन्द्रियम् । 

प्रणीतं भवता येन पुमान् वेदपरावरम् ॥’

वासुदेव ये श्रीकृष्ण वासुदेव थे, जिन्हें भगवान् श्रीकृष्ण के नाम से हम सब जानते हैं। ये वसुदेव के पुत्र होने से वासुदेव कहे जाते थे। इन्होंने सान्दीपनि गुरु के आश्रम में सम्पूर्ण विद्याओं का अध्ययन किया था । वास्तुशास्त्र के विशेष रहस्यों को इन्होंने विश्वकर्मा (त्वष्टा) के पुत्र मय से जान लिया था। इस बात का उल्लेख ‘विश्वकर्मप्रकाश’ (प्रस्तुत ग्रंथ) के अन्त में भी किया गया है। इन्होंने इसी विद्या के अधर पर समुद्र में शत्रुओ से सुरक्षित द्वारकापुरी बनायीं ये आज से ४२००वर्ष पूर्व विद्यमान थी।

अनिरुद्ध ये वासुदेव कृष्ण के पौत्र तथा प्रद्युम्न के पुत्र थे।  इनका गंधर्व विवाह बाणासुर की पुत्री उषा के साथ हुआ था।  ये महाभारत के युद्ध के कुछ काल के उपरान्त तक विद्यमान रहे थे।  अनिरुद्ध को कोई भी योद्धा कितना ही बलशाली हो हाथों से नहीं पकड़ सका और न ही उन्हें कैद किया जा सका, इसीलिये उनका नाम अनिरुद्ध पड़ गया था।

शुक्राचार्य  इनका नाम उशना, काव्य तथा  भार्गव भी था।  इनका जन्म हिरण्यकशिपु के राज्यकाल में ही हुआ था।  ये अनेक शताब्दियों तक जीवित रहे थे।  

ये दैत्यों (असुरों) के पुरोहित थे। इनके पुत्र त्वष्टा (विश्वकर्मा), वरुत्री, शण्ड तथा मर्क थे। त्वष्टा के पुत्र त्रिशिरा (विश्वरूप),  वृत्र,  मय  आदि थे।  इन्होंने पश्चिम के देशों में अपने राज्य को फैलाया और अफ्रीका में त्रिपुरनगर (त्रिपोली), वहीं लेबनान में बेरुत (वरुत्री) की नींव रखी। यूरोप में डेनमार्क (दानवमर्क), दनायु (डेन्यूब) आदि नाम आज भी इसका साक्ष्य दे रहे हैं। त्वष्टा के पुत्र मय के नाम पर अमेरिका में मय राज्य स्थापित हुआ। इन शुक्राचार्य (काव्य, उशना) के महत्त्व को दर्शाते हुए भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है-‘कवीनामुशना कविः’। ये हिरण्यकशिपु से लेकर वृत्रासुर तक दैत्य राजाओं के पुरोहित रहे थे।

                     शुक्राचार्य अनेक विद्याओं एवं ज्ञान-विज्ञानों में निष्णात थे। वे तृतीय वेद व्यास के नाम से भी जाने जाते हैं। औशनस अर्थशास्त्र (शुक्रनीति) के साथ अनेक ग्रंथ उनके नाम से जाने जाते हैं। ज्योतिष ग्रंथों में उनके नाम के उधाहरण मिलते हैं। वे एक श्रेष्ठ वास्तुविद् थे। कब्बाला नामक एक संहिता ग्रन्थ भी उनके काव्यमाला नामक ग्रन्थ का ही नाम है, जो मिश्री (अरबी) तथा हिब्रूभाषाओं में किसी समय ज्योतिष एवं सामुद्रिक ज्ञान के लिये पूरे यूरोप में प्रसिद्ध हो गया था। पारसी धर्मग्रन्थ जेन्दाअवेस्ता (छन्दावस्था) इन्हीं की कृति है। ऋग्वेद के कुछ मन्त्र भी इनके द्वारा दृष्ट हैं। अथर्ववेद के अनेक सूक्त इनके नाम से हैं। ईरानी ग्रन्थों के अनुसार उशाकैकस (उशना काव्य) ईरानियों के अधिपति थे। उशना आयुर्वेद के भी कर्त्ता थे। सुश्रुतसंहिता  तथा अष्टांग हृदय  में इनके विषनाशक औषध प्रयोगों का उल्लेख है।

बृहस्पति इनको बृहस्पति अंगिरस कहते हैं। ये देवताओं के पुरोहित थे। इन्होंने वेदाध्ययन ब्रह्मा कश्यप से किया था तथा पुराणों का अध्ययन शुक्राचार्य से; परंतु शुक्राचार्य की तामसी वृत्ति से इनका मतभेद हो गया था। अतः दोनों में संघर्ष चलता रहा । विवस्वान् तथा इन्द्र इन्हीं के शिष्य थे। राजा उपरिचरवसु भी बृहस्पति का यजमान तथा शिष्य था। ये चौथे वेदव्यास कहे जाते हैं, जिन्होंने वेदमन्त्रों के साथ व्याकरण, अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र, इतिहास, पुराण तथा वास्तुशास्त्र की रचना की थी।

वाल्मीकि रामायण में वास्तुशास्त्र की चर्चा- राजा दशरथ के समय में इस देश में वास्तुशास्त्र अपनी ऊँचाइयों को छू रहा था। अयोध्या नगरी के वास्तुकौशल की बानगी देखिये-

अर्थात् यह पुरी (अयोध्या) बारह योजन (६४ मील-लगभग ९६ कि०मी०) लम्बी तथा तीन योजन (१६ मील- २४ कि०मी०) चौड़ी थी। जिसमें सुविभक्त महापथवाले राजमार्ग थे, जिन पर प्रतिदिन जल का छिड़काव तथा पुष्पवृष्टि होती थी। उस पुरी में महाराज दशरथ इन्द्र की भाँति रहते थे। उसमें कपाट, तोरण, सुविभक्त अन्तरापण (बाजार) थे तथा सभी प्रकार के यन्त्र तथा आयुध थे। इसी प्रकार राजा दशरथ के द्वारा किये गये यज्ञ में शुल्वशास्त्र (यज्ञीय वास्तुशास्त्र) के अनुसार यज्ञशाला निर्माण की भी चर्चा मिलती है, जिसमें इक्कीस खम्भे तथा पक्की ईंटों से निर्मित यज्ञ- कुण्ड का विवरण है—

रामायण में अन्य स्थलों पर भी ऐसे ही विवरण उपलब्ध होते हैं। 

महाभारत में वास्तुशास्त्र की चर्चा – महाभारत में अनेक स्थलों पर वास्तु निर्माण का वर्णन मिलता है। हस्तिनापुर नगर का निर्माण, यादवों की राजधानी द्वारका का निर्माण तथा युद्ध से भागे दुर्योधन का पनडुब्बी (प्रायुव) नामक भवन में जलाशय के बीच में छिपकर निवास करना आदि ऐसी घटनाएँ हैं, जो उस समय की वास्तु- निपुणता को प्रमाणित करती हैं। यहाँ कतिपय उदाहरण द्रष्टव्य हैं-

(१) अपने शिष्यों के अस्त्र- कौशल का प्रदर्शन कराने के लिये आचार्य द्रोण ने रंगमण्डप तैयार कराया था। उसे तैयार करने में इन्होंने वास्तुशास्त्र का पूरा ध्यान रखा। उन्होंने रंगमण्डप के लिये एक समतल भूमि पसन्द की और उसका माप करवाया। उसमें वृक्ष या झाड़-झंखाड़ नहीं थे। वह उत्तर दिशा की ओर नीची थी। वक्ताओं में श्रेष्ठ द्रोण ने वास्तुपूजन देखने के लिये डिण्डिम घोष कराकर वीर समुदाय को आमन्त्रित किया और उत्तम नक्षत्र से युक्त तिथि में उस भूमि पर वास्तुपूजन किया। तत्पश्चात् उनके शिल्पियों ने उस रंगभूमि में वास्तुशास्त्र के अनुसार विधिपूर्वक एक विशाल प्रेक्षागृह की नींव डाली-

(२)लाक्षागृह-प्रकरण से भी यह ज्ञात होता है कि महाभारत काल में वास्तुशास्त्र पर्याप्त समृद्ध था। दुर्योधन ने पुरोचन को चतुःशाल भवन बनाने की आज्ञा दी थी, जिसमें घी, तेल, चर्बी तथा मिट्टी में मिलाकर लाह का प्रयोग करने को  कहा गया था —-  

(३) दैत्यशिल्पी मय के द्वारा तैयार किया गया युधिष्ठिर का अद्भुत सभाभवन भी वास्तुशास्त्र का श्रेष्ठ नमूना था। उसके निर्माण में वास्तुशास्त्र के सिद्धान्तों यथा- शिल्पी का सम्मान, मंगलानुष्ठान, ब्राह्मण भोजन, दान तथा भूमि की माप आदि का सम्यक् पालन हुआ था

(४) पर्वतों के मध्य बने दुर्ग में यदि किसी पर्वत का शिखर गिर जाता है, तो वास्तुशास्त्र के अनुसार वह अशुभ होता है। श्रीकृष्ण ने जब भीम और अर्जुन के साथ जरासंध की राजधानी गिरिव्रज में प्रवेश किया था, तो चैत्यक पर्वत के शिखर को गिरा दिया था। उस समय वेदज्ञ विद्वानों ने इन अपशकुनों की सूचना जरासंध को दी और इस अपशकुन के निवारणार्थ राजा को हाथी पर बैठाकर उसमें चारो ओर प्रज्वलित अग्नि घुमायी थी। राजा जरासंध ने भी अनिष्ट की शांति के लिये व्रत की दीक्षा ली और उपवास किया था-

पालि – प्राकृत एवं अपभ्रंश आदि प्राचीन भाषाओं में वास्तुशास्त्र –  भगवान् बुद्ध का वास्तविक जन्म समय कलियुग के १३१० वर्ष बीतने पर अर्थात् आज से लगभग ३८०० वर्ष पूर्व अथवा ईसासे १८०० वर्ष पूर्व हुआ था परन्तु आज जो उनकी जन्म-तिथि स्कूलों में रटाई जा रही है वह तो बारह सौ वर्ष अर्वाचीन है। उनके समय में भी वास्तुकला उन्नति पर थी। बौद्धकाल में २७ गणतन्त्र थे, उनकी राजधानियों के नगर भव्य रूप में बसे हुए थे। पाटली पुत्र नगर अनेक परकोटों से युक्त था। भिक्षुओं के लिये अनेक विहार तथा भगवान् बुद्ध की अस्थि पर अनेक स्तूप उस काल में बनाये गये। पालि भाषा में श्रीलंका तथा बर्मा आदि में कुछ ग्रन्थ- ज्योतिष आयुर्वेद तथा वास्तुशास्त्र पर भी लिखे गये। उत्तरकाल में भिक्षुओं के लिये अनेक गुफाओं का निर्माण भी हुआ। नालन्दा एवं तक्षशिला के विश्वविद्यालयों के वास्तु भी बौद्धकाल में ही बने। धनी गृहस्थ विशाल बौद्धविहार बनवाकर भिक्षुओं को दान कर देते थे। विमानवत्थु में भिक्षुओं को विहारदान का फल बताते हुए कहा है-

जैन सम्प्रदाय के मन्दिरों के निर्माण के लिये प्राकृत तथा अपभ्रंश भाषाओं में वास्तु-ग्रन्थों की रचना हुई। प्राकृत में स्थपति को ‘थवई’ कहा गया है। संस्कृत में ‘गौतमीयम्’ तथा ‘बौद्धमतम्’ आदि ग्रन्थों की रचना की गयी।

विश्व को भारतीय वास्तुकला की देन – मिश्र के पिरामिडों में कुछ स्थलों पर वैष्णव तिलक लगाये हुए कारीगरों के चित्र खुदे हुए पाये गये हैं, जो इस बात के प्रमाण हैं कि उन पिरामिडों के निर्माता भारतीय ही थे। मुस्लिमतीर्थ मक्का में भी भारतीय वास्तुविदों ने विशाल मन्दिर बनाया था जिसमें हरिहरेश्वर विम्ब (चौकोर पत्थर) के साथ वर्ष के ३६० दिनों (सूर्य के अंशों) की प्रतीक ३६० मूर्तियाँ रखी गयी थीं। इटली की वेटिकन नगरी में आज भी बड़े-बड़े शिवलिंग खड़े हुए हैं। अमेरिका में पुरातत्त्व खुदाईयों में कुछ स्थलों पर गणेशजी की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। अफगानिस्तान की विशाल बुद्ध प्रतिमा भारतीय वास्तुकला का जीता जागता नमूना है। पूर्व के बौद्ध मन्दिरों पर भारतीय वास्तुकला का स्पष्ट प्रभाव दृष्टिगोचर होता है।

इस्लामिक आक्रमण से ग्रन्थों एवं वास्तुकला का नाश – इस्लामिक आक्रमणकारियों ने संस्कृत-पालि एवं प्राकृत के साथ अपभ्रंश एवं प्राचीन तमिल के ग्रन्थों को आग में जला दिया तथा मन्दिरों आदि को ध्वस्त कर दिया गया। अतः अब बहुत-सा उपयोगी साहित्य नष्ट हो गया है। इस सम्बन्ध में प्रसिद्ध वास्तुकलाविद् श्री ई०बी० हेवेल, जो ब्रिटिश शासनकाल में चेन्नई (मद्रास) तथा कोलकाता में वास्तुकला-सम्बन्धी विद्यालयों में प्रधानाचार्य थे, उन्होंने अपनी पुस्तक के प्रारम्भ में लिखा है-

‘भारतीय कला की कुछ-कुछ किंकर्तव्यविमूढकारी भूलभूलैयों में अपना मार्ग प्रन सब गलत एवं भ्रान्त धारणाओं का मूल आधार एक निश्चित विचार है  ——वह यह विश्वास है कि हिन्दू मस्तिष्क में सत्य-सौन्दर्य की भावना सदैव लुप्त रही है और भारतीय वास्तुकला में कुछ महान् है उसका सुझाव अथवा प्रथम परिचय विदेशियों द्वारा ही दिया गया है।’

‘जब अरब लोग अपनी विजय यात्रा पर चले तब उनके मूर्तिभंजक धार्मिक उन्माद के प्रथम शिकार पश्चिम एशिया के बौद्धों, मूर्तिपूजकों के मन्दिर और मठ ही थे ….. वे मूर्तियों को चकना चूर करके शिल्पकलात्मक अलंकरण को विनष्ट करके खाली आलोंवाले भवनों (पूर्ववर्ती बौद्ध देवालयों) को जिनकी सुदृढ़ दीवारें ही शेष रह जाती थीं- प्रायः मस्जिदों में परिवर्तित कर दिया गया था।’

‘बौद्धकला पूर्व शताब्दियों में सारे पश्चिमी एशिया में फैल चुकी थी। बौद्ध- हिन्दूकला उस समय चरमोत्कर्ष पर थी जब भारत को मुहम्मदी आक्रमणों का प्रथम आघात पहुँचा था।’ (विश्व इतिहास के विलुप्त अध्याय)

वास्तुशास्त्र की शाखाएँ —— यों तो वास्तुशास्त्रसंहिता ज्योतिष के अन्तर्गत है, परन्तु वह एक विशाल विषय है, अतः उसकी अनेक शाखाएँ हैं; जिनमें १. यज्ञीय- वास्तु (शुल्वशास्त्र), २. गृहवास्तु, ३. नगरवास्तु (अथवा ग्रामवास्तु), ४. प्रासाद- वास्तु (देवालय), ५. उद्यान (आरामवास्तु) तथा ६. जलाशयवास्तु मुख्य हैं। इन सभी के अतिरिक्त विमान विद्या तथा यन्त्रवास्तु भी दो विशेष शाखाएँ है ।
वास्तुशास्त्र के स्वतन्त्रग्रन्थ ——  वास्तुशास्त्र पर देववाणी संस्कृत में सैकड़ों ग्रन्थ लिखे गये थे, जिनमें से बहुत कुछ जो भी बचे हैं वे चेन्नई, तिरुवनन्तपुरम् बड़ौदा मैसूर आदि के पौर्वात्य पुस्तकालयों में उपलब्ध हैं। इनमें से प्रमुख निम्न हैं – १. वास्तुमण्डन, २. गृहवास्तुसार, ३. निर्दोषवास्तु, ४. वास्तुचक्र, ५. वास्तुशास्त्र (भोजदेव), ६. वास्तुमंजरी, ७. वास्तुवाधिकार, ८. मानविज्ञान, ९. विश्वम्भरवास्तु, १०. प्रासादनिर्णय ११. कुमारवास्तु १२. आयादि लक्षण, १३. वास्तुविधि, १४. वास्तुरनावली, १५. वास्तुपद्धति, १६. वास्तुतिलक, १७. वास्तुसौख्यम्  (टोडरमलकृत),  १८. वास्तुविद्यापति, १९. विश्वकर्मप्रकाश, २०. मयमतम्, २१. मानसार तथा २२.   वास्तुसूत्र उपनिषद् । इनमें से कुछ प्रकाशित भी हो चुके हैं।

प्रस्तुत ग्रन्थ के सम्बन्ध में इस ग्रन्थ का नाम ‘विश्वकर्मप्रकाश’ है। ग्रन्थ के अन्त में दी गयी परम्परा के अनुसार वास्तुशास्त्र का उपदेश गर्ग ने पराशर को पराशर ने बृहद्रथ को तथा बृहद्रथ ने विश्वकर्मा को दिया था। विश्वकर्मा जी से यह वासुदेव श्रीकृष्ण तथा उनसे श्रीअनिरुद्ध को प्राप्त हुआ —-———

‘इति प्रोक्तं वास्तुशास्त्रं पूर्वं गर्गाय धीमते।

गर्गात्पराशरः प्राप्तः तस्मात्प्राप्तो बृहद्रथः ॥

आवश्यक जानकारी नींव खुदवाते समय आवश्यक बातो का रखें ध्यान —

                                   

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FAQ —

प्रश्न – वेदों में वास्तु शास्त्र क्या है ?

उत्तर – विश्व की सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में गृह को वेश्म कहा गया है।  घर की प्राप्ति पुण्यों के फलस्वरुप होती है ये बात भी कही गयी है।  इसी प्रकार वास्तोष्पति का भी उल्लेख किया गया है। इसी प्रकार वास्तोस्पति से स्वास्थ्यप्रद गृह तथा विकासात्मक गृह हेतु प्रार्थना की जाती है। चतुर्थ मंडल में ‘क्षेत्रपति´ नामक देवता से प्रार्थना करते गृह को अन्नभंडार से युक्त बनाने की प्रार्थना की गयी है।अथर्वेद में एक स्थान पर गृह के भीतर रहने वाले दो देवों अग्नी तथा विष्णु से घर को रत्न एवम धन से पूरित करने की प्रार्थना करते हुए कहा गया है  

 प्रश्न – क्या वास्तु का प्रभाव हमारे ग्रहों पर भी पड़ता है ? 

उत्तर – घर की प्राप्ति पुण्यों के फलस्वरुप होती है ये बात भी कही गयी है। घर ही तय करता है के जन्म पत्रिका में कोन-सा ग्रह जन्म पत्रिका में कहाँ विराजमान होगा। जन्मपत्रिका देख कर जातक के घर के वास्तु के बारे में पूर्ण जानकारी मिल जाती है।

 

 

 

 

 

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